मैं यह पढ़कर हैरान हो गई कि रिलायंस इंडिया लिमिटेड, जो कि सबसे अमीर और बड़ी हिन्दोस्तनी कंपनियों में से एक है, केन्द्रीय सरकार को 770 करोड़ रूपये का बिक्री कर नहीं दे रहा है।
रिलायंस उन सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को तेल बेचता है, जिन्होंने रिलायंस के जामनगर स्थित तेल शोधक कारखाने से प्राप्त उत्पादों पर केंद्रीय बिक्री कर देना रोक दिया है। चूंकि रिलायंस उनसे टैक्स की अदायगी नहीं कर पा रहा है, इसलिये वह मांग कर रहा है कि ये टैक्स माफ़ कर दिये जायें और उम्मीद कर रहा है कि सरकार पेट्रोलियम उत्पादों पर टैक्स को माफ करने की उसकी याचिका को मंजूर कर लेगी।
यह टैक्स पहले भूतपूर्व तेल कोष से भरा जा रहा था परन्तु जब यह कोष समाप्त कर दिया गया था, तो गुजरात सरकार ने 2002 -03 के लिये, रिलायंस कंपनी के टैक्स माफ़ कर दिये थे। परन्तु इस साल, भूतपूर्व वित्त मंत्री जसवंत सिंह के अंतरिम बजट के फैसले के अनुसार, 2003 -04 से रिलायंस कंपनी को यह टैक्स भरना था। जाना जाता है कि रिलायंस कंपनी ने संप्रग सरकार से फिर अपील की है कि पेट्रोलियम उत्पादों पर बकाया टैक्स का भुगतान कौन करेगा, यह मुद्दा फिर से उठाया जाए, क्योंकि रिलायंस ने 2003 -04 के अपने खातों से इसका कोई इंतज़ाम नहीं किया है।
मैं एक निजी कंपनी में एकाउंटेंट का काम करती हू। यह कंपनी सरकार और विभिन्न सरकारी मंत्रालयों व उद्यमों को सामग्रियां व सेवायें दिलाती है। कंपनी को अपने ग्राहकों से सेवा कर अदा करना पड़ता है और फिर उसे सरकार को देना पड़ता है। परन्तु कई बार, कुछ ग्राहक, खास तौर पर सरकारी विभागों के ग्राहक, सेवा कर नहीं देते हैं। इसके बावजूद, कंपनी को यह कर सरकार को देना पड़ता है।
यह साफ जाहिर है कि बड़े और मालदार पूंजीपतियों के साथ अलग ही कानून लागू होते हैं। मालदार पूंजीपति पहले मजदूरों का शोषण करके और फिर अपने टैक्स आदि न देकर, अपने आपको और मालदार बनाते हैं।
आपकी पाठक सुधा, नई दिल्ली
रिलायंस उन सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को तेल बेचता है, जिन्होंने रिलायंस के जामनगर स्थित तेल शोधक कारखाने से प्राप्त उत्पादों पर केंद्रीय बिक्री कर देना रोक दिया है। चूंकि रिलायंस उनसे टैक्स की अदायगी नहीं कर पा रहा है, इसलिये वह मांग कर रहा है कि ये टैक्स माफ़ कर दिये जायें और उम्मीद कर रहा है कि सरकार पेट्रोलियम उत्पादों पर टैक्स को माफ करने की उसकी याचिका को मंजूर कर लेगी।
यह टैक्स पहले भूतपूर्व तेल कोष से भरा जा रहा था परन्तु जब यह कोष समाप्त कर दिया गया था, तो गुजरात सरकार ने 2002 -03 के लिये, रिलायंस कंपनी के टैक्स माफ़ कर दिये थे। परन्तु इस साल, भूतपूर्व वित्त मंत्री जसवंत सिंह के अंतरिम बजट के फैसले के अनुसार, 2003 -04 से रिलायंस कंपनी को यह टैक्स भरना था। जाना जाता है कि रिलायंस कंपनी ने संप्रग सरकार से फिर अपील की है कि पेट्रोलियम उत्पादों पर बकाया टैक्स का भुगतान कौन करेगा, यह मुद्दा फिर से उठाया जाए, क्योंकि रिलायंस ने 2003 -04 के अपने खातों से इसका कोई इंतज़ाम नहीं किया है।
मैं एक निजी कंपनी में एकाउंटेंट का काम करती हू। यह कंपनी सरकार और विभिन्न सरकारी मंत्रालयों व उद्यमों को सामग्रियां व सेवायें दिलाती है। कंपनी को अपने ग्राहकों से सेवा कर अदा करना पड़ता है और फिर उसे सरकार को देना पड़ता है। परन्तु कई बार, कुछ ग्राहक, खास तौर पर सरकारी विभागों के ग्राहक, सेवा कर नहीं देते हैं। इसके बावजूद, कंपनी को यह कर सरकार को देना पड़ता है।
यह साफ जाहिर है कि बड़े और मालदार पूंजीपतियों के साथ अलग ही कानून लागू होते हैं। मालदार पूंजीपति पहले मजदूरों का शोषण करके और फिर अपने टैक्स आदि न देकर, अपने आपको और मालदार बनाते हैं।
आपकी पाठक सुधा, नई दिल्ली

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